Thursday, 18 January 2018

Dr. Sarvepalli Radhakrishnan


नाम – डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
जन्म – 5सितम्बर, 1888 को तिरुतानी, मद्रास

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को मद्रास शहर (चेन्नई) से लगभग 50 किलोमीटर दूर तमिलनाडु राज्य के तिरुतनी नामक गाँव में हुआ था | उनका परिवार अत्यंत धार्मिक था | उन्होंने प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा मिशन स्कूल, तिरुपति तथा बेलौर कॉलेज, बेलौर में प्राप्त की | सन 1905 में उन्होंने मद्रास के क्रिश्चियन कॉलेज में प्रवेश लिया यहां से बी.ए. तथा
एम.ए. की उपाधि प्राप्त की | इनको मद्रास प्रेसिडेंसी कॉलेज में सहायक लेक्चरार के रुप में और मैसूर यूनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रुप में नौकरी मिली। 30 वर्ष की उम्र में, इन्हें
सर आशुतोष मुखर्जी (कलकत्ता विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर) के द्वारा मानसिक और नैतिक विज्ञान के किंग जार्ज वी चेयर से सम्मानित किया गया |

डॉ. राधकृष्णन आंध्र यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बने और बाद में तीन वर्ष के लिये पूर्वी धर्म और नीतिशास्त्र में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर भी रहे | ये 1939 से 1948 तक
बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर भी रहे |डॉ. राधाकृष्णन एक अच्छे लेखक भी थे जिन्होंने भारतीय परंपरा, धर्म और दर्शन पर कई लेख और किताबें लिखी है | वो 1952 से 1962
तक भारत के उप राष्ट्रपति थे और 1962 से 1967 तक भारत के राष्ट्रपति रहे तथा सी.राजगोपालचारी और सी.वी.रमन के साथ भारत रत्न से सम्मानित किये गये |वो एक महान शिक्षाविद्और मानवतावादी थे इसी वजह से शिक्षकों के प्रति प्यार और सम्मान प्रदर्शित करने के लिये पूरे देश भर में विद्यार्थियों के द्वारा हर वर्ष शिक्षक दिवस के रुप में उनके जन्म दिवस को मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन भाषण कला में इतने निपुण थे कि उन्हें विभिन्न देशों में भारतीय एंव पाश्चात्य दर्शन पर भाषण देने के लिए बुलाया जाता था | उनमें विचारों, कल्पना तथा भाषा द्वारा लोगों को प्रभावित करने की ऐसी अद्भुत शक्ति थी कि उनके भाषणों से लोग मंत्रमुग्ध रह जाते थे | उनके भाषणों की यह विशेषता दर्शन एंव आध्यात्म पर उनकी अच्छी पकड़ के साथ-साथउनकी आध्यात्मिक शक्ति के कारण भी थी | उनके राष्ट्रपतित्व काल के दौरान 1962 ई. में भारत-चीन युद्ध 1965 ई. में भारत-पाक युद्ध लड़ा गया था | इस दौरान उन्होंने अपने ओजस्वी भाषणों से भारतीय सैनिकों के मनोबल को ऊंचा उठाने में अपनी सराहनीय भूमिका अदा की |

डॉ. राधाकृष्णन के कुछ प्रसिद्ध विचार ये हैं, “दर्शनशास्त्र एक रचनात्मक विद्या है | प्रत्येक व्यक्ति ही ईश्वर की प्रतिमा है | अंतरात्मा का ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता है | दर्शन का उद्देश्य जीवन की
व्याख्या करना नहीं, बल्कि जीवन को बदलना है | एक शताब्दी का दर्शन ही दूसरी शताब्दी का सामान्य ज्ञान होता है | दर्शन का अल्पज्ञान मनुष्य को नास्तिकता की ओर झुका देता है, परंतु
दार्शनिकता की गहनता में प्रवेश करने पर, मनुष्य का मन, धर्म की ओर उन्मुख हो जाता है | धर्म और राजनीति का सामंजस्य असंभव है, एक सत्य की खोज करता है, तो दूसरे को सत्य से कुछ लेना-देना नहीं |”

डॉ. राधाकृष्णन की मृत्यु 16 अप्रैल 1975 को हो गई, परंतु अपने जीवनकाल में अपने ज्ञान से जो आलोक उन्होंने फैलाया था, वह आज भी पूरी दुनिया को आलोकित कर रहा है | बड़े-से-बड़े
पद पर रहकर भी वे हमेशा विनम्र बने रहे और राजनीति के दांव-पेंच ने उन्हें कभी भी विचलित नहीं किया | वे उदारता, कर्तव्यपरायणता, सनातन मंगल भावना, ईमानदारी और सहजता इन
सबके साकार प्रतिबिम्ब थे | वे एक महान शिक्षाविद भी थे और शिक्षक होने का उन्हें गर्व था | यही कारण है कि उनके जन्मदिन 5 सितंबर को ‘शिक्षक दिवस’ के रुप में मनाया जाता है | ‘गीता’
में प्रतिपादित कर्मयोग के सिद्धांतों के अनुसार, वे एक निर्विवाद निष्काम कर्मयोगी थे, जिन्होंने भारतीय संस्कृति के उपासक तथा राजनीतिज्ञ दोनों ही रूप में एक विश्व नागरिक की भांति मानव
समाज का प्रतिनिधित्व किया | वे आज हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका ज्ञानालोक सदा हमारा मार्ग प्रदीप्त करता रहेगा |

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