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Sunday, 4 June 2017

Narendra Modi


पूरा नाम - नरेन्द्र दामोदरदास मोदी
जन्म - 17  सितम्बर, 1950
जन्म भूमि - गुजरात का एक छोटा सा कस्बा, वड़नगर ग्राम
पिता - दामोदरदास मूलचन्द मोदी
माता - हीराबेन मोदी

जन्म

नरेन्द्र मोदी का जन्म गुजरात के एक छोटे से कस्बे, वड़नगर ग्राम में हीराबेन मोदी और दामोदरदास मूलचन्द मोदी के एक मध्यम-वर्गीय परिवार में 17 सितम्बर 1950 को हुआ था। उनका परिवार बहुत ग रीब था और एक कच्चे मकान में रहता था। दो वक्त की रोटी भी बड़ी मुश्किल से मिलती थी। नरेंद्र मोदी की माँ आस पड़ोस में बर्तन साफ करती थी ताकि अपने बच्चों का पालन पोषण कर सके। उनके पिता रेलवे स्टेशन पर चाय की एक छोटी सी दुकान चलाते थे। मोदी बचपन में अपने पिता की चाय की दुकान में उनका हाथ बटाते थे और रेल के डिब्बों में चाय बेचते थे।

शिक्षा

चाय की दुकान संभालने के साथ साथ मोदी पढ़ाई लिखाई का भी पूरा ध्यान रखते थे। मोदी को पढ़ने का बहुत शौक था। वे अक्सर अपने स्कूल के पुस्तकालय में घंटों बिता दिया करते थे।मोदी शुरू से ही एक कुशल वक्ता थे और उनमें नेतृत्व करने की अद्भुत क्षमता थी। वे नाटकों और भाषणों में जमकर हिस्सा लेते थे। नरेंद्र को खेलों में भी बहुत दिलचस्पी थी। बचपन से ही मोदी में देश भक्ति कूट कूट कर भरी थी। 1962 में भारत चीन युद्ध के दौरान मोदी रेलवे स्टेशन पर जवानों से भरी ट्रेन में उनके लिए खाना और चाय लेकर जाते थे। 1965 में भारत पाक युद्ध के दौरान भी मोदी ने जवानों की खूब सेवा की। युवावस्था में मोदी पर स्वामी विवेकानंद का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा। 17 साल की उम्र में मोदी ने घर छोड़ दिया और अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू की। उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों का भ्रमण किया। उन्होंने हिमालय में ऋषीकेश, बंगाल में रामकृष्ण आश्रम और पूर्वोत्तर भारत की यात्रा की और फिर दो वर्ष बाद वे घर लौट आए। इन यात्राओं से उन्हें स्वामी विवेकानंद को और गहराई से जानने का सौभाग्य मिला जिसने उन्हें पूरी तरह बदल दिया। जब वे घर लौटे, उनका मकसद साफ था- राष्ट्र की सेवा। वे केवल दो सप्ताह ही घर पर रुके और फिर अहमदाबाद के लिए निकल पड़े। वहाँ जाकर वे आर.एस.एस. के सदस्य बन गए। 1972 में मोदी आर.एस.एस. के प्रचारक बन गए और अपना सारा समय आर.एस.एस. को देने लगे। और इसी समय इन्होंने अपनी शिक्षा पूरी की और राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल की।

परिवारिक जीवन

13 वर्ष की आयु में नरेन्द्र की सगाई जसोदा बेन चमनलाल के साथ कर दी गयी और जब उनका विवाह हुआ, वह मात्र 17 वर्ष के थे। उन दोनों की शादी जरूर हुई परन्तु वे दोनों एक साथ कभी नहीं रहे। शादी के कुछ बरसों
बाद नरेन्द्र मोदी ने घर त्याग दिया था और एक प्रकार से उनका वैवाहिक जीवन लगभग समाप्त-सा ही हो गया।

राजनैतिक जीवन

उन्होंने शुरुआती जीवन से ही राजनीतिक सक्रियता दिखलायी और भारतीय जनता पार्टी का जनाधार मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभायी। गुजरात में शंकरसिंह वाघेला का जनाधार मजबूत बनाने में नरेन्द्र मोदी की ही रणनीति थी। अप्रैल 1990 में जब केन्द्र में मिली जुली सरकारों का दौर शुरू हुआ, मोदी की मेहनत रंग लायी, जब गुजरात में 1995 के विधान सभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने दो तिहाई बहुमत प्राप्त कर सरकार बना ली। इसके बाद शंकरसिंह वाघेला ने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया, जिसके परिणामस्वरूप केशुभाई पटेल को गुजरात का मुख्यमन्त्री बना दिया गया और नरेन्द्र मोदी को दिल्ली बुला कर भाजपा में संगठन की दृष्टि से केन्द्रीय मन्त्री का दायित्व सौंपा गया। 1995 में राष्ट्रीय मन्त्री के नाते उन्हें पाँच प्रमुख राज्यों में पार्टी संगठन का काम दिया गया जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। 1998 में उन्हें पदोन्नत करके राष्ट्रीय महामन्त्री का उत्तरदायित्व दिया गया। इस पद पर वह अक्टूबर 2001 तक काम करते रहे। भारतीय जनता पार्टी ने अक्टूबर 2001 में केशुभाई पटेल को हटाकर गुजरात के मुख्यमन्त्री पद की कमान नरेन्द्र मोदी को सौंप दी। गोआ में भाजपा कार्यसमिति द्वारा नरेन्द्र मोदी को 2014 के लोक सभा चुनाव अभियान की कमान सौंपी गयी थी। 13 सितम्बर 2013 को हुई संसदीय बोर्ड की बैठक में आगामी लोकसभा चुनावों के लिये प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। एक सांसद प्रत्याशी के रूप में उन्होंने देश की दो लोकसभा सीटों वाराणसी तथा वडोदरा से चुनाव लड़ा और दोनों निर्वाचन क्षेत्रों से विजयी हुए। नरेन्द्र मोदी स्वतन्त्र भारत में जन्म लेने वाले ऐसे व्यक्ति हैं जो सन 2001 से 2014 तक लगभग 13 साल गुजरात के 14वें मुख्यमन्त्री रहे और हिन्दुस्तान के 15 वें प्रधानमन्त्री बने। नरेन्द्र मोदी ने  26 मई 2014 को प्रधानमन्त्री पद की शपथ ली।

पुरस्कार

अप्रैल 2016 में नरेन्द्र मोदी सउदी अरब के उच्चतम नागरिक सम्मान 'अब्दुलअजीज अल सऊद के आदेश' से सम्मानित किये गये हैं। जून 2016 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अफगानिस्तान के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार अमीर अमानुल्ला खान अवॉर्ड से सम्मानित किया।

Manmohan Singh


पूरा नाम - मनमोहन सिंह
जन्म - 26  सितम्बर, 1932
जन्म भूमि - पंजाब प्रांत का गाह नामक गॉव (इस समय पाकिस्तान में)
पिता - गुरुमुख सिंह
माता - अमृत कौर

जन्म

मनमोहन सिंह का जन्म अखंड भारत के पंजाब प्रान्त (वर्तमान पाकिस्तान) स्थित गाह में 26  सितम्बर, 1932 को एक सिख परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरुमुख सिंह था। छोटी उम्र में ही उनकी माता का निधन हो गया और इसलिए उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया। देश के विभाजन के बाद उनका का परिवार अमृतसर चला आया।

शिक्षा

डॉ० मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय से स्नातक तथा स्नातकोत्तर स्तर की पढ़ाई पूरी की और आगे की पढाई करने के लिए वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गये । कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से पी०एच०डी की डिग्री प्राप्‍त की थी। सन् 1955 और 1957 में कैंब्रिज के सेंट जॉन्स कॉलेज में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए 'राइट्स पुरस्कार' से सम्मानित किया गया।उन्होंने आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से डी. फिल. भी किया। उनकी पुस्तक इंडियाज़ एक्सपोर्ट ट्रेंड्स एंड प्रोस्पेक्ट्स फॉर सेल्फ सस्टेंड ग्रोथ भारत की अन्तर्मुखी व्यापार नीति की पहली और सटीक आलोचना मानी जाती है। डॉ॰ सिंह ने अर्थशास्त्र के अध्यापक के तौर पर काफी ख्याति अर्जित की। वे पंजाब विश्वविद्यालय और बाद में प्रतिष्ठित दिल्ली स्कूल ऑफ इकनामिक्स में प्राध्यापक रहे।

राजनैतिक जीवन

डॉ० मनमोहन सिंह  1971में  भारत के वाणिज्य एवं उद्योग मन्त्रालय में आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किये गये। इसके तुरन्त बाद 1972 में उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार बनाया गया। इसके बाद के वर्षों में वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष, रिजर्व बैंक के गवर्नर, प्रधानमन्त्री के आर्थिक सलाहकार और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अध्यक्ष भी रहे हैं। जब पी वी नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने मनमोहन सिंह को 1991 में अपने मंत्रिमंडल में सम्मिलित करते हुए वित्त मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंप दिया। इस समय डॉ॰ मनमोहन सिंह न तो लोकसभा और न ही राज्यसभा के सदस्य थे। लेकिन संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार सरकार के मंत्री को संसद का सदस्य होना आवश्यक होता है। इसलिए उन्हें 1991 में असम से राज्यसभा के लिए चुना गया।1998-2004 के दौरान जब भारत में बीजेपी की सरकार थी तब वे राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे। 2004 के आम चुनाव में लोक सभा चुनाव न जीत पाने के बावजूद मनमोहन सिंह को यूपीए की अध्यक्षा सोनिया गाँधी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में अनुमोदित किया। डॉ० मनमोहन सिंह को 2009 में एक बार फिर से भारत के प्रधानमंत्री के पद पर चुना गया। जवाहरलाल नेहरु के बाद मनमोहन सिंह एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री थे जिन्हें 5 साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद फिर से प्रधानमंत्री चुना गया।

पुरस्कार

1994 में उन्हें डिस्टिंगग्विश्ट फेलो ऑफ़ लन्दन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से सम्मानित किया गया। 1999 में डॉ मनमोहन सिंह को राष्ट्रीय कृषि विज्ञान संस्था, नई दिल्ली, द्वारा सदस्यता दी गई। 2002 में उन्हें अन्ना साहेब चिरमुले ट्रस्ट की ओर से अन्ना साहेब चिरमुले पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दो वर्ष बाद भारतीय संसदीय दल की तरफ से उन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार दिया गया। 2010 में उन्हें अपील ऑफ़ कान्शन्स फौन्डेशन की ओर से वर्ल्ड स्टैट्स्मन पुरस्कार प्रदान किया गया।

Tuesday, 23 May 2017

Inder Kumar Gujral


पूरा नाम - इन्द्र कुमार गुजराल
जन्म - 4 दिसंबर, 1919
जन्म भूमि - पंजाब के प्रांत झेलम
पिता - अवतार नारायण गुजराल 
माता - पुष्पा गुजराल 

जन्म

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और पूर्व विदेश मंत्री इंद्रकुमार गुजराल का जन्म 4 दिसंबर को 1919 को झेलम में हुआ, जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता का नाम अवतार नारायण गुजराल और माता का नाम पुष्पा गुजराल था।उनके माता-पिता दोनों देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हुए थे। 11 वर्ष की आयु में इंद्रकुमार गुजराल अपने भाई प्रसिद्ध चित्रकार सतीश और बहन उमा के साथ देश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। 1942 में वे भारत छोड़ो आंदोलन में जेल भी गए।

शिक्षा

इन्द्र कुमार गुजराल की शिक्षा दीक्षा डी०ए०वी० कालेज, हैली कॉलेज ऑफ कामर्स और फॉर्मन क्रिश्चियन कॉलेज लाहौर में हुई। उन्होंने बी.ए, एम.ए, पी.एच.डी और डी. लिट् की उपाधियां प्राप्त कीं। हिन्दी, उर्दू और पंजाबी भाषा में निपुण होने के अलावा वे कई अन्य भाषाओं के जानकार भी थे और शेरो-शायरी में काफी दिलचस्पी रखते थे।

राजनैतिक जीवन
इंद्रकुमार गुजराल के राजनीतिक जीवन की शुरुआत कॉलेज के दिनों में ही हो चुकी थी। वे लाहौर में स्टूडेंट यूनियन के अध्यक्ष थे। पढ़ाई पूरी करने के बाद इंद्रकुमार गुजराल ने कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ले ली। कुछ समय तक गुजराल ने बीबीसी हिन्दी पर पत्रकार के रूप में भी काम किया। मात्र बारह वर्ष की आयु में उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेना शुरू कर दिया था। भारत छोड़ो आंदोलन में अपनी सक्रिय भूमिका के चलते 23 वर्ष की आयु में उन्हें जेल भी जाना पड़ा। स्वतंत्रता के पश्चात केन्द्रीय राज्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए इन्होंने संचार एवं संसदीय कार्य मंत्रालय, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, सड़क एवं भवन मंत्रालय तथा योजना एवं विदेश मंत्रालय के कार्य भी संभाले। यह कॉग्रेस पार्टी से लंबे समय तक जुड़े रहे तथा राजनायिक के रूप में इन्दिरा गांधी को भी अपनी सेवाएं प्रदान की। लेकिन जल्द ही इनका कॉग्रेस से मोह भंग हो गया और इन्होंने जनता दल की सदस्यता ले ली। और जल्द ही देवगौड़ा के इस्तीफे के बाद गुजराल को प्रधानमंत्री पद प्राप्त हो गया। प्रशासनिक कार्यों के अलावा इन्द्र कुमार गुजराल के पास शासन का भी अनुभव था जो उनके बहुत काम आया।

मृत्यु 

वे लम्बे समय से डायलिसिस पर चल रहे थे। 19 नवम्बर 2012 को छाती में संक्रमण के बाद उन्हें हरियाणा स्थित गुड़गाँव के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहाँ इलाज के दौरान ही उनकी हालत गिरती चली गयी। 27 नवम्बर 2012 को वे अचेतावस्था में चले गये। काफी कोशिशों के बाद भी उन्हें बचाया नहीं जा सका। आखिरकार 30 नवम्बर 2012 को उनकी आत्मा ने उनका शरीर छोड़ दिया।

Sunday, 21 May 2017

H.D. Dev Gowda


पूरा नाम - हरदनहल्ली डोडे गौड़ा देव गौड़ा
जन्म -18 मई 1933
जन्म भूमि -  हरदनहल्ली गांव, हासन, कनार्टक
पिता - डोडे गोवड़ा
माता - देवअम्मा

जन्म

एच.डी. देवगौड़ा' का जन्म 18 मई, 1933 को कर्नाटक के हरदन हल्ली ग्राम में हुआ था। उनका पूरा नाम हरदन हल्ली डोडेगौड़ा देवगौड़ा है। उनके पिता का नाम श्री दोड्डे गौड़ा तथा माता का नाम देवम्या था।

शिक्षा

 श्रीमती एल.व्ही. पॉलिटेक्निक कॉलेज, हसन, कर्नाटक से उन्होंने सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा हासिल किया था।

परिवारिक जीवन

 उन्होंने चिनम्मा से विवाह किया और उनके चार पुत्र हैं – एच.डी. बालकृष्ण गौड़ा, एच.डी. रेवन्ना, डा. एच.डी. रमेश और एच.डी. कुमार स्वामी हैं। उनकी दो पुत्रियां भी हैं जिनका नाम एच.डी. अनुसुइया और एच.डी. शैलजा है। उनके एक पुत्र एच.डी. कुमारस्वामी कनार्टक के मुख्यमंत्री रह चुके हैं।

राजनैतिक जीवन

गौड़ा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छोटी उम्र में की। वे पढ़ाई पूरी करने के बाद 20 वर्ष की आयु में  राजनीति में आ गए। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल होकर सन 1962 तक पार्टी के कार्यकर्ता रहे। इसके बाद उन्होंने कनार्टक विधानसभा के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। वे राज्य विधानसभा में 1972-1976 तक और 1976-1977 तक विपक्ष के नेता रहे। सन 1975 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गए आपातकाल के दौरान वे 18 महीने जेल में रहे। इस दौरान उन्होंने कई किताबें पढ़कर और उस दौर में जेल में बंद नेताओं से बात करके अपना राजनीतिक ज्ञान बढ़ाया। इस ज्ञान से उनका राजनैतिक व्यक्तित्व और विचार दोनों ही निखरे। 22 नवंबर 1982 को गौड़ा ने छठवीं विधानसभा से त्यागपत्र दे दिया। इसके बाद वह सातवीं और आठवीं विधानसभा में लोकनिर्माण व सिंचाई मंत्री बने। सिंचाई मंत्री के कार्यकाल के दौरान उन्होंने सिंचाई की कई नई योजनाएं शुरू कीं। 1987 में उन्होंने मंत्रीमंडल छोड़ दिया और सिंचाई के लिए अपर्याप्त धन दिए जाने का विरोध किया। 1989 में उन्हें हार का स्वाद चखना पडा। इसके बाद 1991 में वह हासन संसदीय क्षेत्र से संसद के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने कर्नाटक के लोगों खासतौर पर किसानों की समस्याएं उठाने में अहम भूमिका निभाई। आम जनता के साथ-साथ उन्हें संसद में भी सभी से बहुत सम्मान मिला। वह दो बार जनता दल के नेता बने। इसके बाद वह जनता दल पार्टी की ओर से विधायक दल के नेता चुने गए और 11 दिसंबर 1994 को कनार्टक के 14वें मुख्यमंत्री के तौर पर पदभार संभाला। 1996 में कांग्रेस पार्टी को लोक सभा चुनाव में हार मिली और प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव को पद से इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद एच.डी. देवगोवड़ा देश के 11वें प्रधानमंत्री बने। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। वह 1 जून 1996 से 21 अप्रैल 1997 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे।
सामान्य मध्यम वर्गीय कृषक परिवार से संबंध एच.डी. देवगौड़ा के व्यक्तित्व पर साफ दिखाई देता है। वह अपने सिद्धांतों और कर्तव्यों के प्रति सचेत रहते थे और किसानों की परेशानियों और उनके परिश्रम का मोल भली-भांति समझते थे।

Sunday, 14 May 2017

Atal Bihari Vajpayee


पूरा नाम - अटल बिहारी वाजपेयी
जन्म -25 दिसम्बर 1924
जन्म भूमि - ग्वालियर
पिता - कृष्णा बिहारी वाजपेयी
माता - कृष्णा देवी

जन्म

अटल बिहारी वाजपेयी' का जन्म 25 दिसंबर 1924 ई० को भारत के मध्य प्रदेश राज्य में स्थित ग्वालियर के शिंदे की छावनी में हुआ था। इनके पिता श्री कृष्ण बिहारी वाजपेयी ग्वालियर में ही अध्यापन कार्य करते थे। अटलजी के दादा पं० श्याम लाल बिहारी वाजपेयी जाने-माने संस्कृत के विद्वान थे।

शिक्षा

वाजपेयी ने ग्वालियर के बारा गोरखी के गोरखी ग्राम की गवर्नमेंट हायरसेकण्ड्री स्कूल से शिक्षा ग्रहण की थी। बाद में वे शिक्षा प्राप्त करने ग्वालियर विक्टोरिया कॉलेज (अभी लक्ष्मी बाई कॉलेज) गये और हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत में डिस्टिंक्शन से पास हुए। उन्होंने कानपूर के दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज से पोलिटिकल साइंस में अपना पोस्ट ग्रेजुएशन एम.ए में पूरा किया। इसके लिये उन्हें फर्स्ट क्लास डिग्री से भी सम्मानित किया गया था।

राजनैतिक जीवन


ग्वालियर के आर्य कुमार सभा से उन्होंने राजनैतिक काम करना शुरू किये, वे उस समय आर्य समाज की युवा शक्ति माने जाते थे। और 1944 में वे उसके जनरल सेक्रेटरी भी बने। 1939 में एक स्वयंसेवक की तरह वे राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गये। और वहा बाबासाहेब आप्टे से प्रभावित होकर, उन्होंने 1940-44 के दर्मियान आरएसएस प्रशिक्षण कैंप में प्रशिक्षण लिया और 1947 में आरएसएस के फुल टाइम वर्कर बन गये। अटल बिहारी वाजपेयी भारत के 10 वे पूर्व प्रधानमंत्री है। वे पहले 1996 में 13 दिन तक और फिर 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे। वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता है, भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस के बाहर के इंसान होते हुए भारत की पांच साल तक सेवा करने वाले वे पहले प्रधानमंत्री हैं। इसके अलावा लोकसभा चुनावो में वाजपेयी जी ने नौ बार जीत हासिल की है। जब उन्होंने स्वास्थ समस्या के चलते राजनीती से सन्यास ले लिया था तब उन्होंने 2009 तक लखनऊ, उत्तर प्रदेश के संसद भवन की सदस्य बनकर भी सेवा की है। वाजपेयी भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य भी है। मोरारजी देसाई की सरकार में सन् 1977 से 1979 तक विदेश मन्त्री भी रहे और विदेशों में भारत की छवि को निखारा है। भारत की संस्कृति, सभ्यता, राजधर्म, राजनीति और विदेश नीति की इनको  गहरी समझ है। प्रधानमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल में जहां इन्होंने पाकिस्तान और चीन से संबंध सुधारने हेतु अभूतपूर्व कदम उठाए वहीं अंतर राष्ट्रीय दवाबों के बावजूद गहरी कूटनीति तथा दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए  पोकरण में परमाणु विस्फोट किए तथा कारगिल-युद्ध जीता। राजनीति में दिग्गज राजनेता, विदेश नीति में संसार भर में समादृत कूटनीतिज्ञ, लोकप्रिय जननायक और कुशल प्रशासक होने के साथ-साथ ये  एक अत्यंत सक्षम और संवेदनशील कवि और लेखक भी रहे हैं। विभिन्न संसदीय प्रतिनिधिमंडलों के सदस्य और विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री के रूप में इन्होंने  विश्व के अनेक देशों की यात्राएं की हैं और भारतीय कुटनीति तथा विश्वबंधुत्व का घ्वज लहराया है।

प्रमुख रचनायें
 
मृत्यु या हत्या,
सेक्युलर वाद,
अमर आग है,
कैदी कविराय की कुण्डलियाँ,
संसद में तीन दशक,
बिन्दु बिन्दु विचार,
अमर बलिदान,
राजनीति की रपटीली राहें,
कुछ लेख: कुछ भाषण, इत्यादि।

पुरस्कार

पद्म विभूषण(1992)
लोकमान्य तिलक पुरस्कार(1994)
श्रेष्ठ सासंद पुरस्कार(1994)
भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार(1994)
डी लिट (मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय)(2015)
'फ्रेंड्स ऑफ बांग्लादेश लिबरेशन वार अवॉर्ड', (बांग्लादेश सरकार द्वारा प्रदत्त)(2015)
भारतरत्न से सम्मानित(2015)




Saturday, 13 May 2017

P.V. Narsimha Rao


पूरा नाम - पामुलापति वेंकट नरसिंह राव
जन्म - 28 जून, 1921
जन्म भूमि - वन्गारा, आंध्र प्रदेश
मृत्यु - 23 दिसम्बर, 2004
पिता - पी. रंगा राव
माता - रुक्मिनिअम्मा

जन्म

पी.वी. नरसिंह राव' का पूरा नाम नाम पामुलापति वेंकट नरसिंह राव है। उनका जन्म 28 जून, 1921 में करीमनगर, आंध्र प्रदेश में हुआ था। उनके पिता पी. रंगा राव और माता रुक्मिनिअम्मा कृषक थे।

शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा उन्होंने करीमनगर जिले के भीमदेवारापल्ली मंडल के कटकुरु गाँव में पूरी की थी, वहाँ वे अपने रिश्तेदार गब्बेता राधाकिशन राव के घर में रहते थे और ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के आर्ट्स कॉलेज में बैचलर डिग्री हासिल करने के लिए पढते थे। बाद में वे हिस्लोप कॉलेज पढने के लिए गये, जो अब नागपुर यूनिवर्सिटी के अधीन आता है। वहाँ रहते हुए उन्होंने लॉ में मास्टर डिग्री पूरी की थी। राव की मातृभाषा तेलगु थी और मराठी भाषा पर भी उनकी अच्छी-खासी पकड़ थी। इसके साथ-साथ दूसरी आठ भाषाओ (हिंदी, ओरिया, बंगाली, गुजरती, कन्नड़, संस्कृत, तमिल और उर्दू भाषा) के साथ-साथ वे इंग्लिश, फ्रेंच, अरबिक, स्पेनिश, जर्मन और पर्शियन भाषा भी बोल लेते थे।

राजनैतिक जीवन

नरसिंह राव भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान एक सक्रीय कार्यकर्ता थे और आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गए। राजनीति में आने के बाद राव ने पहले आन्ध्र प्रदेश और फिर बाद में केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण विभागों का कार्यभार संभाला। आंध्र प्रदेश सरकार में सन 1962 से 64 तक वे कानून एवं सूचना मंत्री, सन 1964 से 67 तक कानून एवं विधि मंत्री, सन 1967 में स्वास्थ्य एवं चिकित्सा मंत्री और सन 1968 से 1971 तक शिक्षा मंत्री रहे। नरसिंह राव सन 1971 से 1973 तक आंध्र प्रदेश राज्य के मुख्यमंत्री भी रहे। वे सन 1957 से लेकर सन 1977 तक आंध्र प्रदेश विधान सभा और सन 1977 से 1984 तक लोकसभा के सदस्य रहे और दिसंबर 1984 में रामटेक सीट से आठवीं लोकसभा के लिए चुने गए। राजनीति में उनके विविध अनुभव के कारण ही उन्हें केंद्र सरकार में गृह, रक्षा और विदेश मंत्रालय जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी सौंपी गयी। नरसिंह राव 14 जनवरी 1980 से 18 जुलाई 1984 तक विदेश मंत्री, 19 जुलाई 1984 से 31 दिसंबर 1984 तक गृह मंत्री एवं 31 दिसंबर 1984 से 25 सितम्बर 1985 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे। उन्होंने मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में भी केंद्र सरकार में कार्य किया। नरसिंह राव ने सक्रीय राजनीति से लगभग संन्यास सा ले लिया था पर राजीव गाँधी की हत्या के बाद उनकी किस्मत पलटी और वे एकाएक भारतीय राजनीति के केंद्रबिंदु बन गए। सन 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने सबसे अधिक सीटों पर विजय हासिल की पर उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका था। इसके बाद नरसिंह राव को अल्पमत सरकार चलने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। इस प्रकार राव नेहरु-गाँधी परिवार के बाहर पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने पूरे पांच साल प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया। वे पहले दक्षिण-भारतीय प्रधानमंत्री भी थे।

मृत्यु

9 दिसम्बर 2004 को राव को हार्ट अटैक आया था और इसके तुरंत बाद उन्हें ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंस में भर्ती किया गया और भर्ती करने के 14 दिनों बाद 83 साल की आयु 23 दिसम्बर को उन्होंने अंतिम सांसे लीं।

Thursday, 4 May 2017

Chandra Shekhar


 पूरा नाम - चन्द्रशेखर सिंह
जन्म - 17 अप्रैल, 1927
जन्मस्थान - उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में स्थित इब्राहिमपत्ती गांव
मृत्यु - 8 जुलाई, 2007


जन्म

उनका जन्म 17 अप्रैल, 1927 में पूर्वी उत्तरप्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपत्ती गांव के एक कृषक परिवार में हुआ था।


शिक्षा

इनकी स्कूली शिक्षा भीमपुरा के राम करन इण्टर कॉलेज में हुई। उन्होंने 1951 में एम ए डिग्री इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। उन्हें विद्यार्थी राजनीति में एक "फायरब्रान्ड" के नाम से जाना जाता था। विद्यार्थी राजनीती में वे जल्दी उत्तेजित होने वाले इंसान के रूप में जाने जाते है। डॉ. राम मनोहर लोहिया के साथ मिलकर उन्होंने ग्रेजुएशन के बाद अपने राजनैतिक करियर की शुरुवात की थी।

राजनीतिक जीवन

राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद ही वह समाजवादी आंदोलन से जुड़ गए थे। और बाद में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी, बल्लिया से वे सेक्रेटरी के पद पर नियुक्त हुए। एक साल के भीतर ही, उनकी नियुक्ती उत्तर प्रदेश राज्य में PSP के जॉइंट सेक्रेटरी के पद पर की गयी। 1955-56 में वे राज्य में पार्टी के जनरल सेक्रेटरी बने। 1962 में उत्तर प्रदेश के राज्य सभा चुनाव से उनका संसदीय करियर शुरू हुआ। अपने राजनीतिक करियर के शुरुवाती दिनों में वे आचार्य नरेंद्र देव के साथ रहने लगे थे। 1962 से 1967 तक शेखर का संबंध राज्य सभा से था। लेकिन जब उस समय आनी-बानी की घोषणा की गयी थी, तब उन्हें कांग्रेस पार्टी का राजनेता माना गया था और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर पटियाला जेल भी भेजा था। जेल में बिताये समय में उन्होंने हिंदी में एक डायरी लिखी थी जो बाद में ‘मेरी जेल डायरी’ के नाम से प्रकाशित हुई। ‘सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता’ उनके लेखन का एक प्रसिद्ध संकलन है। उन्होंने देश की भलाई के लिए राष्ट्रिय स्तर पर 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक दक्षिण के कन्याकुमारी से नई दिल्ली में राजघाट (महात्मा गांधी की समाधि) तक लगभग 4260 किलोमीटर की मैराथन दूरी पैदल (पदयात्रा) तय की थी। उनके इस पदयात्रा का एकमात्र लक्ष्य था – लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना। चंद्र शेखर सोशलिस्ट पार्टी के मुख्य राजनेता थे। उन्होंने बैंको के राष्ट्रीयकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सबसे पहले 1967 में वे लोक सभा में दाखिल हुए थे। कांग्रेस पार्टी के सदस्य रहते हुए, उन्होंने कई बार इंदिरा गाँधी और उनके कार्यो की आलोचना की थी। इस वजह से 1975 में उन्हें कांग्रेस पार्टी से अलग होना पड़ा था। इसी कारणवश आनी-बानी की परिस्थिति में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। आनी-बानी के तुरंत बाद, चंद्रशेखर 1977 में स्थापित जनता पार्टी के अध्यक्ष बन गये और उन्होंने राज्य में पहली अकांग्रेस सरकार बनायी। जिसमे उन्हें सफलता भी मिली। इसके बाद संसदीय चुनाव में जनता पार्टी ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया और फिर उन्होंने मोरारी देसाई के साथ एक संगठन भी बनाया। 1988 में यह पार्टी दूसरी पार्टियों में मिल गयी और फिर व्ही.पी. सिंह के नेतृत्व में एक नयी सरकार का गठन किया गया। इसके कुछ समय बाद एक बार फिर चंद्रशेखर ने संगठित होकर, जनता दल सोशलिस्ट नाम के पार्टी की स्थापना की। फिर कांग्रेस की सहायता से, विशेषतः राजीव गाँधी के सहयोग से वे नवम्बर 1990 में व्ही.पी. सिंह की जगह प्रधानमंत्री बने। चंद्र शेखर सात महीनो तक प्रधानमंत्री भी बने थे, चरण सिंह के बाद वे दुसरे सबसे कम समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री थे। अपने कार्यकाल में उन्होंने डिफेन्स और होम अफेयर्स के कार्यो को भी संभाला था। उनकी सरकार में 1990-91 का खाड़ी युद्ध भी शामिल है। इतना ही नहीं बल्कि उनकी सरकार पूरा बजट भी पेश नही कर पायी थी क्योकि कांग्रेस ने उनका साथ देने से मना कर दिया था। 1991 की बसंत ऋतू में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दुसरे चुनाव में हिस्सा लेने की ठानी थी। और इसके चलते 6 मार्च 1991 में ही चंद्रशेखर ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।


मृत्यु

शेखरजी को मल्टिपल मायलोमा, एक प्रकार का प्लाज्मा कोष कैंसर हुआ था। उनको इस रोग के इलाज हेतु गंभीर अवस्था में नयी दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। उनके 80 वे जन्मदिन के एक हफ्ते बाद ही 8 जुलाई 2007 को चंद्रशेखर की मृत्यु हो गयी थी।

Wednesday, 3 May 2017

V.P. Singh


पूरा नाम - विश्वनाथ प्रताप सिंह
जन्म -25 जून 1931
जन्मस्थान - इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु - 27 नवंबर 2008
पिता - राजा बहादुर राय गोपाल सिंह

 
जन्म

विश्वनाथ प्रताप सिंह का जन्म 25 जून 1931 में उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद के एक समृद्ध परिवार में हुआ था। विश्वनाथ प्रताप सिंह के पिता का नाम राजा बहादुर राय गोपाल सिंह था। उनका परिवार मंदा की जागीरदारी पर राज करता था।


शिक्षा

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इलाहाबाद और पूना विश्वविद्यालय में अध्ययन किया था। वह 1947-1948 में उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी की विद्यार्थी यूनियन के अध्यक्ष रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह इलाहाबाद विश्वविद्यालय की स्टूडेंट यूनियन में उपाध्यक्ष भी थे। 25 जून 1955 को श्रीमती सीता कुमारी से उनका विवाह हुआ एवं उनके दो बेटे हैं।

 
राजनीतिक जीवन

विश्वनाथ प्रताप सिंह का राजनैतिक सफर युवाकाल से ही प्रारंभ हो गया था।समृद्ध परिवार से संबंधित होने के कारण उन्हें जल्दी ही सफलता मिल गई। जल्द ही विश्वनाथ प्रताप भारतीय कॉग्रेस पार्टी से संबंधित हो गए थे। सन 1961 में वह उत्तर प्रदेश के विधानसभा में पहुंचे। वे 9 जून 1980 से 28 जून 1982 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे लेकिन जल्दी ही वह 29 जनवरी 1983 से केंद्रीय वाणिज्य मंत्री बन गए। इसके अलावा वह 16 जुलाई 1983 से  राज्यसभा के सदस्य और 31 दिसंबर 1984 को  देश के वित्तमंत्री भी बने। इसी बीच उनका टकराव राजीव गांधी से हो गया। बोफोर्स तोप घोटाले की वजह से भारतीय समाज में कॉग्रेस की छवि बेहद खराब हो गई जिसका वी.पी. सिंह ने पूरा फायदा उठाया।1989 के चुनाव में कॉग्रेस को भारी क्षति का सामना करना पड़ा लेकिन वी.पी सिंह के राष्ट्रीय मोर्चें को बहुमत मिला और जनता पार्टी और वामदलों की सहायता से उन्होंने प्रधानमंत्री का पद हासिल किया।

 
मृत्यु

काफी समय तक बहुत से बीमारियों से घिरने के बाद दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में 27 नवम्बर 2008 को उनकी मृत्यु हुई थी। वह काफी समय से गुर्दे की बीमारी से पीड़ित थे। अलाहाबाद में गंगा नदी के किनारे पर 29 नवम्बर 2008 को उनका अंतिम संस्कार उनके बेटे अजेय सिंह की उपस्थिति में किया गया।

Tuesday, 2 May 2017

Rajiv Gandhi


पूरा नाम - राजीव फिरोज गांधी
जन्म - 20 अगस्त, 1944
जन्मस्थान - बम्बई
मृत्यु - 21 मई, 1991
पिता - फिरोज गांधी
माता - इंदिरा गांधी

जन्म

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को भारत के सबसे प्रसिद्ध राजनैतिक परिवार में हुआ था। उनके दादा जवाहरलाल नेहरू ने भारतकी आज़ादी की लड़ाई में मुख्य भूमिका अदा की और स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री बने। उनके माता पिता अलग-अलग रहते थे अतः राजीव गांधी का पालन पोषण उनके दादा के घर पर हुआ जहाँ उनकी माँ रहती थीं।

शिक्षा

राजीव गांधी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा देहरादून के मशहूर दून स्कूल से पूरी की। जहाँ महानायक अमिताभ बच्चन से इनकी मित्रता हुई। इसके बाद लंदन विश्वविद्यालय ट्रिनिटी कॉलेज और बाद मे कैंब्रिज में इंजिनियरिंग पढाई करने लगे। 1965 तक वे केम्ब्रिज मे रहे। लेकिन उन्होने अपनी इंजिनियरिंग की पढ़ाई पूरी नही की। 1966 मे वे भारत वापस आ गये। उस टाइम तक उनकी मा इंदिरा गाँधी भारत की प्रधानमंत्री बन चुकी थी। इसके बाद राजीव दिल्ली के फ्लाइंग क्लब से पायलट की ट्रैनिंग ली। और एक कमर्शियल एयरलाइन में पायलट बन गए। उनके छोटे भाई संजय गांधी राजनीति में प्रवेश कर चुके थे और अपनी माँ इंदिरा गांधी के भरोसेमंद प्रतिनिधि बन गए। लंदन की कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ते हुए राजीव की मुलाकात एक लड़की से हुई जो इटली की रहने वाली थी और नाम था एडविग एन्टोनिया एल्बीना माइनो। यही वो लड़की है जो शादी के बाद सोनिया गांधी बनकर भारत आई।


राजनीतिक जीवन

राजीव गांधी की राजनीति में कोई रूचि नहीं थी और वो एक एयरलाइन पाइलट की नौकरी करते थे। आपातकाल के उपरान्त जब इन्दिरा गांधी को सत्ता छोड़नी पड़ी थी, तब कुछ समय के लिए राजीव परिवार के साथ विदेश में रहने चले गए थे। परंतु 1980 में अपने छोटे भाई संजय गांधी की एक हवाई जहाज़ दुर्घटना में असामयिक मृत्यु के बाद माता इन्दिरा को सहयोग देने के लिए सन् 1982 में राजीव गांधी ने राजनीति में प्रवेश लिया। वो अमेठी से लोकसभा का चुनाव जीत कर सांसद बने और 31अक्टूबर 1984 को सिख आतंकवादियों द्वारा प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी की हत्या किए जाने के बाद भारत के प्रधानमंत्री बने और अगले आम चुनावों में सबसे अधिक बहुमत पाकर प्रधानमंत्री बने रहे। उनके प्रधानमंत्रित्व काल में भारतीय सेना द्वारा बोफ़ोर्स तोप की खरीदारी में लिए गये किकबैक (कमीशन - घूस) का मुद्दा उछला। अगले चुनाव में कांग्रेस की हार हुई और राजीव को प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा।


उपलब्धियां

राजीव गांधी एक सशक्त और कुशल राजनेता ही नहीं थे, अपितु स्वप्नदृष्टा प्रधानमन्त्री थे । समय से पूर्व भारत को 21वीं सदी में ले जाने वाले इस प्रधानमन्त्री ने भविष्य के भारत का जो सपना देखा था, उसमें सम्पूर्ण भारत में ज्ञान, संचार, सूचना, तकनीकी सेवाओं के साथ मुख्यत: उसे कम्प्यूटर से जोड़ना था । वे भारत को एक अक्षय ऊर्जा का स्त्रोत बनाना चाहते थे । उनकी इस नवीन कार्यशैली और सृजनात्मकता का ही परिणाम है कि आज भारत सौर ऊर्जा से लेकर देश के कोने-कोने में कम्प्यूटर से जुड़ गया है । आज देश के घर-घर में कम्प्यूटर का उपयोग राजीव गांधी की ही दूरदर्शी सोच का परिणाम है । अपनी विदेश नीति के तहत उन्होंने कई देशों की यात्राएं की । भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक सम्बन्ध बढ़ाये । फिलीस्तीनी संघर्ष, स्वापो आन्दोलन, नामीबिया की स्वतन्त्रता का समर्थन, अफ्रीकी फण्ड की स्थापना के साथ-साथ माले में हुए विद्रोह का दमन, श्रीलंका की आतंकवादी समस्या पर निर्भीक दृष्टि रखना, हिन्द महासागर में अमेरिका तथा पाक के बढ़ते सामरिक हस्तक्षेप पर अंकुश लगाना, यह उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियां हैं ।


मृत्यु

21 मई, 1991 को मद्रास से 50 किमी. दूर स्थित श्री पेरुंबुदुर में एक चुनाव सभा में लोगों से हार लेते समय तमिल आतंकवादियों ने उन्हे एक बम विस्फ़ोट में हत्या कर दी।

Friday, 28 April 2017

Chaudhary Charan Singh


नाम - चौधरी चरण सिंह
जन्म तिथि - 23 दिसम्बर, 1902.
जन्म स्थान - नूरपुर ग्राम, मेरठ, उत्तर प्रदेश.
मृत्यु - 29 मई, 1987.
पिता - चौधरी मीर सिंह
माता - श्रीमती नेत्रा कौर

जन्म

चरण सिंह का जन्म एक जाट परिवार मेबाबूगढ़ छावनी के निकट नूरपुर गांव, तहसील हापुड़, जनपद गाजियाबाद, कमिश्नरी मेरठ में काली मिट्टी के अनगढ़ और फूस के छप्पर वाली मढ़ैया में 23 दिसम्बर,1902 को हुआ। इनके परिवार का सम्बन्ध बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह से था जिन्होंने 1887 की क्रान्ति में विशेष योगदान दिया था। ब्रिटिश हुकूमत ने नाहर सिंह को दिल्ली के चाँदनी चौक में फ़ाँसी पर चढ़ा दिया था। अंग्रेज़ों के अत्याचार से बचने के लिए नाहर सिंह के समर्थक और चौधरी चरण सिंह के दादा उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर ज़िले में निष्क्रमण कर गए।

शिक्षा

चौधरी चरण सिंह को आरम्भ से ही शैक्षणिक वातावरण प्राप्त हुआ जिसके कारण उनका शिक्षा के प्रति अतिरिक्त रुझान रहा। उनकी प्राथमिक शिक्षा नूरपुर में ही हुई और उसके बाद मैट्रिकुलेशन के लिए उनका दाखिला मेरठ के सरकारी हाई स्कूल में करा दिया गया। सन 1923 में में चरण सिंह ने विज्ञान विषय में स्नातक किया और दो वर्ष बाद सन 1925 में उन्होंने ने कला वर्ग में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से क़ानून की पढ़ाई की और फिर विधि की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद सन 1928 में गाज़ियाबाद में वक़ालत आरम्भ कर दिया। वकालत के दौरान वे अपनी ईमानदारी, साफगोई और कर्तव्यनिष्ठा के लिए जाने जाते थे। चौधरी चरण सिंह उन्हीं मुकदमों को स्वीकार करते थे जिनमें मुवक्किल का पक्ष उन्हें न्यायपूर्ण प्रतीत होता था।

राजनीतिक जीवन

1937 में सबसे पहले वे छपरौली से चरण सिंह उत्तर प्रदेश वैधानिक असेंबली के लिए चुने गये थे और फिर उन्होंने 1946, 1952 और 1967 में निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी किया। 1946 में पंडित गोविंद बल्लभ पन्त की सरकार में वे संसदीय सेक्रेटरी बने और बहुत से विभागों में कार्यरत थे, जैसे की रेवेन्यु, मेडिकल, सामाजिक स्वास्थ विभाग, न्याय और सुचना विभाग इत्यादि। जून 1951 में उनकी नियुक्ती राज्य के कैबिनेट मंत्री के रूप में की गयी और उन्होंने न्याय और सुचना विभाग का चार्ज दिया गया। बाद में 1952 में डॉ. संपूर्णानंद के कैबिनेट में वे रेवेन्यु और एग्रीकल्चर मंत्री बने। इसके बाद अप्रैल 1959 में जब उन्होंने इस्तीफा दिया तब उन्हें रेवेन्यु और ट्रांसपोर्ट विभाग का चार्ज दिया गया। श्री सी.बी. गुप्ता की मिनिस्ट्री में वे होम एंड एग्रीकल्चर मिनिस्टर (1960) थे। श्री चरण सिंह ने श्रीमती सुचेता कृपलानी की मिनिस्ट्री में एग्रीकल्चर एंड फारेस्ट मंत्री (1962-63) रहते हुए देश की सेवा की थी। इसके बाद में उन्होंने एग्रीकल्चर विभाग को 1965 में छोड़ दिया था और 1966 में उन्होंने स्थानिक सरकारी विभागों का चार्ज दिया गया था।
वो किसानों के नेता माने जाते रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था।  किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। वो 3 अप्रैल 1967 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 17 अप्रैल 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दुबारा 17 फ़रवरी 1970 के वे मुख्यमंत्री बने। उसके बाद वो केन्द्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल और अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की। 1979 में वित्त मंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक की स्थापना की। 28 जुलाई 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से प्रधानमंत्री बने। श्री चरण सिंह ने बहुत से पदों पर रहते हुए उत्तर प्रदेश राज्य की सेवा की है और वहाँ के लोगो का जीत जितने में भी वे सफल हुए। चरण सिंह अपने राज्य में हमेशा से ही कठिन परिश्रम करने वाले और ईमानदार नेता के रूप में पहचाने जाते है।

अनमोल विचार

1.असली भारत गांवों में रहता है।

2. भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे वो देश कभी, चाहे कोई भी लीडर आ जाये, चाहे कितना ही अच्छा प्रोग्राम चलाओ … वो देश तरक्की नहीं कर सकता।

3. किसानों की दशा सुधरेगी तो देश सुधरेगा।

4. चौधरी का मतलब, जो हल की चऊँ को धरा पर चलाता है।

5. किसानों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होगी तब तक देश की प्रगति संभव नहीं है।

6. किसान इस देश का मालिक है, परन्तु वह अपनी ताकत को भूल बैठा है।

7. राष्ट्र तभी संपन्न हो सकता है जब उसके ग्रामीण क्षेत्र का उन्नयन किया गया हो तथा ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति अधिक हो।

8. देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों एवं खलिहानों से होकर गुजरता है।

9. किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ती तब तक औधोगिक उत्पादों की खपत भी संभव नहीं है।

मृत्यु

29 मई 1987 को इनका निधन हो गया।

Morarji Desai


पूरा नाम - मोरारजी देसाई
जन्म - 29 फरवरी 1896
जन्म भूमि - भदेली, ब्रिटिश प्रेसीडेंसी
मृत्यु -10 अप्रैल 1995
पिता -  रणछोड़जी देसाई

जन्म


मोरारजी देसाई का जन्म 29 फ़रवरी 1896 को गुजरात के भदेली नामक स्थान पर हुआ था। उनका संबंध एक ब्राह्मण परिवार से था। उनके पिता रणछोड़जी देसाई भावनगर (सौराष्ट्र) में एक स्कूल अध्यापक थे। वह अवसाद (निराशा एवं खिन्नता) से ग्रस्त रहते थे, अत: उन्होंने कुएं में कूद कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। पिता की मृत्यु के तीसरे दिन मोरारजी देसाई की शादी हुई थी।

शिक्षा

मोरारजी देसाई की शिक्षा-दीक्षा मुंबई के एलफिंस्टन कॉलेज में हुई जो उस समय काफ़ी महंगा और खर्चीला माना जाता था। मुंबई में मोरारजी देसाई नि:शुल्क आवास गृह में रहे जो गोकुलदास तेजपाल के नाम से प्रसिद्ध था। विद्यार्थी जीवन में मोरारजी देसाई औसत बुद्धि के विवेकशील छात्र थे। इन्हें कॉलेज की वाद-विवाद टीम का सचिव भी बनाया गया था लेकिन स्वयं मोरारजी ने मुश्किल से ही किसी वाद-विवाद प्रतियोगिता में हिस्सा लिया होगा। मोरारजी देसाई ने अपने कॉलेज जीवन में ही महात्मा गाँधी, बाल गंगाधर तिलक और अन्य कांग्रेसी नेताओं के संभाषणों को सुना था। ग्रेजुएट होने के बाद वे गुजरात के सिविल सर्विस में शामिल हो गये. मई 1930 में गोदरा के डिप्टी कलेक्टर के पद से उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

राजनीतिक जीवन

सरकारी नौकरी छोड़ने का बाद मोरारजी देसाई स्वाधीनता आन्दोलन में कूद पड़े। इसके बाद उन्होंने महात्मा गाँधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरूद्ध ‘सविनय अवज्ञा’ आन्दोलन में भाग लिया। स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान मोरारजी कई बार जेल गए। सन 1931 में वह गुजरात प्रदेश की कांग्रेस कमेटी के सचिव बने और फिर अखिल भारतीय युवा कांग्रेस की शाखा स्थापित कर उसके अध्यक्ष बन गए। अपने नेतृत्व कौशल से वह स्वतंत्रता सेनानियों के चहेते और गुजरात कांग्रेस के महत्वपूर्ण नेता बन गए। सन 1934 और 1937 के प्रांतीय चुनाव के बाद उन्हें बॉम्बे प्रेसीडेंसी का राजस्व और गृह मंत्रालय सौंपा गया।1952 में इन्हें बंबई प्रान्त का मुख्यमंत्री बनाया गया। गुजरात तथा महाराष्ट्र दोनों बंबई प्रोविंस के अंतर्गत आते थे। इसी दौरान भाषाई आधार पर दो अलग राज्य – माहाराष्ट्र (मराठी भाषी क्षेत्र) और गुजरात (गुजरात भाषी क्षेत्र) – बनाने की मांग बढ़ने लगी पर मोरारजी इस तरह के विभाजन के लिए तैयार नहीं थे। सन 1960 में मोरारजी ने ‘संयुक्त महाराष्ट्र समिति’ के प्रदर्शनकारियों पर गोली चलने आ आदेश इया जिसमे लगभग 105 लोग मारे गए। इस घटना के बाद मोरारजी को बॉम्बे के मुख्य मंत्री पद से हटाकर केंद्र में बुला लिया गया।केंद्र सरकार में मोरारजी को गृह मंत्री बनाया गया। गृह मंत्री के तौर पर उन्होंने फिल्मों और नाटकों के मंचन में अभद्रता प्रतिबंधित कर दिया था। वह नेहरु के समाजवाद का विरोध करते थे।

एक प्रधानमंत्री के रूप

पण्डित जवाहर लाल नेहरू के समय कांग्रेस में जो अनुशासन था, वह उनकी मृत्यु के बाद बिखरने लगा। कई सदस्य स्वयं को पार्टी से बड़ा समझते थे। मोरारजी देसाई भी उनमें से एक थे। श्री लालबहादुर शास्त्री ने कांग्रेस पार्टी के वफ़ादार सिपाही की भाँति कार्य किया था। उन्होंने पार्टी से कभी भी किसी पद की मांग नहीं की थी। लेकिन इस मामले में मोरारजी देसाई अपवाद में रहे। कांग्रेस संगठन के साथ उनके मतभेद जगज़ाहिर थे और देश का प्रधानमंत्री बनना इनकी प्राथमिकताओं में शामिल था। इंदिरा गांधी ने जब यह समझ लिया कि मोरारजी देसाई उनके लिए कठिनाइयाँ पैदा कर रहे हैं तो उन्होंने मोरारजी के पर कतरना आरम्भ कर दिया। इस कारण उनका क्षुब्ध होना स्वाभाविक था। नवम्बर 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन कांग्रेस-आर और कांग्रेस-ओ के रूप में हुआ तो मोरारजी देसाई इंदिरा गांधी की कांग्रेस-आई के बजाए सिंडीकेट के कांग्रेस-ओ में चले गए। फिर 1975 में वह जनता पार्टी में शामिल हो गए। मार्च 1977 में जब लोकसभा के चुनाव हुए तो जनता पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हो गया।इसके बाद 23 मार्च 1977 को 81 वर्ष की अवस्था में मोरारजी देसाई ने भारतीय प्रधानमंत्री का दायित्व ग्रहण किया। प्रधानमंत्री के रूप में श्री देसाई चाहते थे कि भारत के लोगों को इस हद तक निडर बनाया जाए कि देश में कोई भी व्यक्ति, चाहे वो सर्वोच्च पद पर ही आसीन क्यों न हो, अगर कुछ गलत करता है तो कोई भी उसे उसकी गलती बता सके। उन्होंने बार-बार यह कहा, “कोई भी, यहाँ तक कि प्रधानमंत्री भी देश के कानून से ऊपर नहीं होना चाहिए”। उनके लिए सच्चाई एक अवसर नहीं बल्कि विश्वास का एक अंग था। उन्होंने शायद ही कभी अपने सिद्धांतों को स्थिति की बाध्यताओं के आगे दबने दिया। मुश्किल परिस्थितियों में भी वे प्रतिबद्धता के साथ आगे बढ़ते गए। वह स्वयं यह मानते थे – ‘सभी को सच्चाई और विश्वास के अनुसार ही जीवन में कर्म करना चाहिए’।

मृत्यु

 
मोरारजी देसाई का देहांत 99 वर्ष की आयु में 10 अप्रैल 1995 में हुआ।

Friday, 21 April 2017

Indira Gandhi




पूरा नाम - इन्दिरा प्रियदर्शिनी गाँधी
जन्म - 19 नवम्बर 1917
जन्म भूमि - इलाहाबाद
मृत्यु - 31 अक्टूबर 1984
पिता - जवाहरलाल नेहरू
माता - कमला नेहरू


जन्म

इन्दिरा का जन्म 19 नवंबर, सन् 1917 में पंडित जवाहरलाल नेहरू और उनकी पत्नी कमला नेहरू के यहाँ हुआ। वे उनकी एकमात्र संतान थीं। नेहरू परिवार अपने पुरखों का खोंज जम्मू और कश्मीर तथा दिल्ली केब्राह्मणों में कर सकते हैं। इंदिरा के पितामह मोतीलाल नेहरू उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद से एक धनी बैरिस्टर थे। जवाहरलाल नेहरू पूर्व समय में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बहुत प्रमुख सदस्यों में से थे। उनके पिता मोतीलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक लोकप्रिय नेता रहे।इंदिरा का बचपन बहोत नाराज़ और अकेलेपन से भरा पड़ा था। उनके पिता राजनैतिक होने के वजह से कई दिनों से या तो घर से बाहर रहते और या तो जेल में बंद रहते, उनकी माता को बिमारी होने की वजह से वह पलंग पर ही रहती थी। और बाद में उनकी माता को जल्दी ही ट्यूबरकुलोसिस की वजह से मृत्यु प्राप्त हुई। और इंदिरा का अपने पिताजी के साथ बहोत कम संबंध था, ज्यादातर वे पत्र व्यवहार ही रखते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर की “प्रियदर्शिनी”, नेहरु की इंदिरा, मोरार जी देसाई की गुंगी गुङिया, दृढ़निश्चयी और किसी भी तरह की परिस्थिति से जूझने और जीतने की क्षमता रखने वाली शक्तीशाली महिला श्रीमति इंदिरा गाँधी भारत की पहली एवं अब तक की एक मात्र महिला प्रधानमंत्री हैं।


शिक्षा

इंदिरा जी को ज्यादातर घर पर ही पढाया जाता था और रुक-रुक कर कभी-कभी वह मेट्रिक के लिए स्कूल चले भी जाती।वो दिल्ली में मॉडर्न स्कूल, सेंट ससिल्लिया और सेंट मैरी क्रिस्चियन कान्वेंट स्कूल, अल्लाहाबाद की विद्यार्थी रह चुकी है। साथ भी एकोले इंटरनेशनल, जिनेवा, एकोले नौवेल्ले, बेक्स और पुपिल्स ओन स्कूल, पुन और बॉम्बे की भी विद्यार्थिनी रह चुकी है। बाद में वो पढने के लिए शान्तिनिकेतन के विश्वा भारती महाविद्यालय गयी। और उनके साक्षात्कार के समय ही रबिन्द्रनाथ टैगोर ने उनका नाम प्रियदर्शिनी रखा और तभी से वह इंदिरा प्रियदर्शिनी नेहरु के नाम से पहचानी गयी। एक साल बाद उन्होंने वह विश्वविद्यालय अपनी माता के अस्वस्थ होने की वजह से छोड़ दिया और यूरोप चली गयी। वहा उन्होंने अपनी पढाई ओक्स्फोर्फ़ विश्वविद्यालय से पूरी की। ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में, वो इतिहास, राजनितिक विज्ञानं और अर्थशास्त्र में अच्छी थी लेकिन लैटिन में इतनी अच्छी नहीं थी, जो आवश्यक विषय था उसमे वो इतनी होशयार नहीं थी।
यूरोप में इंदिरा जी को किसी बड़ी बीमारी ने घेर लिया था कई बार डॉक्टर उनकी जाच करने आते-जाते रहता थे. वो जल्द से जल्द ठीक होना चाहती थी ताकि फिर से अपनी पढाई पर ध्यान दे सके। जब नाज़ी आर्मी तेज़ी से यूरोप की परास्त कर रही थी उस समय इंदिरा वहा पढ़ रही थी। इंदिरा जी ने पोर्तुगाल से इंग्लैंड आने के कई प्रयास भी किये लेकिन उनके पास 2 महीने का ही स्टैण्डर्ड बचा हुआ था। लेकिन 1941 में आखिर वे इंग्लैंड आ ही गयी, और वहा से अपनी पढाई पूरी किये बिना ही भारत वापिस आ गयी। बाद में उनके विश्वविद्यालय ने आदरपूर्वक डिग्री प्रदान की. 2010 में, ऑक्सफ़ोर्ड ने 10 आदर्श विद्यार्थियों में उनका नाम लेकर उन्हें सम्मान दिया। इंदिरा ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में एशिया की एक आदर्श महिला थी।


राजनैतिक जीवन 

1959 और 1960 के दौरान इंदिरा चुनाव लड़ीं और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष चुनी गयीं। उनका कार्यकाल घटनाविहीन था। वो अपने पिता के कर्मचारियों के प्रमुख की भूमिका निभा रहीं थीं। नेहरू का देहांत 27 मई, 1964 को हुआ और इंदिरा नए प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के प्रेरणा पर चुनाव लड़ीं और तत्काल सूचना और प्रसारण मंत्री के लिए नियुक्त हो, सरकार में शामिल हुईं। 11 जनवरी 1966 को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री की असामयिक मृत्यु के बाद 24 जनवरी 1966 को श्रीमती इंदिरा गांधी भारत की तीसरी और प्रथम महिला प्रधानमंत्री बनीं। इसके बाद तो वह लगातार तीन बार 1967-1977 और फिर चौथी बार 1980-84 देश की प्रधानमंत्री बनीं। 1967 के चुनाव में वह बहुत ही कम बहुमत से जीत सकी थीं लेकिन 1971 में फिर से वह भारी बहुमत से प्रधामंत्री बनीं और 1977 तक रहीं।1977 के बाद वह 1980 में एक बार फिर प्रधानमंत्री बनीं और 1984 तक प्रधानमंत्री के पद पर रहीं।


पुरस्कार 

1971 में ‘भारतरत्न’


विशेषता

भारत की पहली महिला प्रधानमंत्री 
  भारतरत्न मिलने वाली पहली महिला

अनमोल विचार

1. एक  देश  की  ताकत  अंततः  इस  बात  में  निहित  है  कि  वो  खुद  क्या  कर  सकता  है , इसमें  नहीं  कि  वो  औरों  से  क्या  उधार  ले  सकता  है।

2. भारत की नागरिकता एक साझी नागरिकता है. अगर एक भी नागरिक के लिए कोई ख़तरा पैदा होता है, चाहे वह जिस समुदाय, जाति, धर्म या भाषा समूह का हो, तो वह ख़तरा हम सबके लिए है।और सबसे ख़राब बात यह है की यह स्थिति हमारी प्रतिष्ठा घटाती है।

3. क्षमा  वीरों  का  गुण  है।

4. शहादत  कुछ  ख़त्म नहीं करती , वो  महज़  शुरआत  है।

5. यदि  मैं  इस  देश  की  सेवा  करते  हुए  मर  भी  जाऊं , मुझे  इसका  गर्व  होगा . मेरे  खून  की  हर एक  बूँद इस  देश  की  तरक्की  में  और इसे   मजबूत   और  गतिशील  बनाने  में  योगदान  देगी।


मृत्यु

 पंजाब में सिक्ख आतंकवादियों ने स्वायत्त राज्य की माँग पर ज़ोर देने के लिए हिंसा का रास्ता अपना लिया। जवाब में श्रीमती गांधी ने जून 1984 में सिक्खों के पवित्रतम धर्मस्थल अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर पर सेना के हमले के आदेश दिए, जिसके फलस्वरूप 450 से अधिक सिक्खों की मृत्यु हो गई। स्वर्ण मन्दिर पर हमले के प्रतिकार में पाँच महीने के बाद 31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती गांधी के आवास पर तैनात उनके दो सिक्ख अंगरक्षकों ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी।उनका अंतिम संस्कार 3 नवंबर को राज घाट के समीप हुआ और यह जगह शक्ति स्थल के रूप में जानी गई।

Tuesday, 18 April 2017

Lal Bahadur Shastri


पूरा नाम - लालबहादुर शास्त्री
वास्तविक नाम -  लाल बहादुर श्रीवास्तव
जन्म - 2 अक्टूबर,1904
जन्म भूमि - वाराणसी के समीप, उत्तर प्रदेश
मृत्यु - 11 जनवरी, 1966
पिता -  शारदा प्रसाद श्रीवास्तव

जन्म

भारत के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को  उत्तर प्रदेश के एक सामान्य निम्नवर्गीय परिवार में हुआ था। आपका वास्तविक नाम लाल बहादुर श्रीवास्तव था। शास्त्री जी के पिता शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक शिक्षक थे व बाद में उन्होंने भारत सरकार के राजस्व विभाग में क्लर्क के पद पर कार्य किया।

शिक्षा

माता कि मृत्य़ु के बाद इनका बचपन बहुत कठिनाइओं में बीता, मीलों पैदल चलकर और नदियां तैरकर इन्होंने शिक्षा हासिल की। इनपर श्री रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द का बहुत प्रभाव था।  शास्त्री जी बापू गांधी के आंदोलनों में बड़ चढ़ कर भाग लेते थे, 1921 में विद्यार्थी जीवन में ही जेल गये।और बाद में लाल बहादुर की शिक्षा हरीशचंद्र उच्च विद्यालय और काशी विद्या पीठ में हुई। आपने स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण की तत्पश्चात् आपको 'शास्त्री' की उपाधि से सम्मानित किया गया। 


राजनैतिक जीवन 

भारत की स्वतंत्रता के पश्चात शास्त्रीजी को उत्तर प्रदेश का संसदीय सचिव नियुक्त किया गया। गोविंद बल्लभ पंत के मंत्रीमंडल में आपको पुलिस एवं यातायात मंत्रालय सौंपा गया। परिवहन मंत्री के अपने कार्यकाल में आपने महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की।
1951 में, जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में आप अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी के महासचिव नियुक्त किए गए।  1952, 1957 व 1962 के चुनावों में कांग्रेस पार्टी को भारी बहुमत से विजय का श्रेय आपके अथक परिश्रम व प्रयास का परिणाम था।
आपकी प्रतिभा और निष्ठा को देखते हुए भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के पश्चात कांग्रेस पार्टी ने 1964 में लाल बहादुर शास्त्री को प्रधानमंत्री पद का उत्तरदायित्व सौंपा। आपने 9 जून 1964 को भारत के प्रधान मन्त्री का पद भार ग्रहण किया।
प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने 26 जनवरी, 1965 को देश के जवानों और किसानों को अपने कर्म और निष्ठा के प्रति सुदृढ़ रहने और देश को खाद्य के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनाने के उद्देश्य से ‘जय जवान, जय किसान' का नारा दिया।  यह नारा आज भी भारतवर्ष में लोकप्रिय है।  


अनमोल विचार

1. देश के प्रति निष्ठा सभी निष्ठाओं से पहले आती है. और यह पूर्ण निष्ठा है क्योंकि इसमें कोई प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि बदले में उसे क्या मिलता है.

2. आर्थिक मुद्दे हमारे लिए सबसे ज़रूरी हैं, और यह बेहद महत्त्वपूर्ण है कि हम अपने सबसे बड़े दुश्मन गरीबी और बेरोजगारी से लड़ें.

3. क़ानून का सम्मान किया जाना चाहिए ताकि हमारे लोकतंत्र की बुनियादी संरचना बरकरार रहे और और भी मजबूत बने.

4. हम सभी को अपने अपने  क्षत्रों में उसी समर्पण , उसी उत्साह, और उसी संकल्प के साथ काम करना होगा जो रणभूमि में एक योद्धा को प्रेरित और उत्साहित करती है. और यह सिर्फ बोलना नहीं है, बल्कि वास्तविकता में कर के दिखाना है.

5. जो शाशन करते हैं उन्हें देखना चाहिए कि लोग प्रशाशन पर किस तरह प्रतिक्रिया करते हैं. अंततः , जनता ही मुखिया होती है.

6. हमारी ताकत और स्थिरता के लिए हमारे सामने जो ज़रूरी काम हैं उनमे लोगों में एकता और एकजुटता स्थापित करने से बढ़ कर कोई काम नहीं है.

7. हम सिर्फ अपने लिए ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के लिए शांति और शांतिपूर्ण विकास में विश्वास रखते हैं.

8. यदि कोई एक व्यक्ति को भी ऐसा रह गया जिसे किसी रूप में अछूत कहा जाए तो भारत को अपना सर शर्म से झुकाना पड़ेगा.

9. लोगों को सच्चा लोकतंत्र या स्वराज कभी भी असत्य और हिंसा से प्राप्त नहीं हो सकता है.

10. आज़ादी की रक्षा केवल सैनिकों का काम नही है . पूरे देश को मजबूत होना होगा.



मृत्यु

1965 में पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया I शास्त्री जी ने अपने सैनिकों का इतना हौंसला बढ़ाया की भारतीय सेना ने पाकिस्तानी सेना को तहस नहस कर दिया और पाकिस्तान की बुरी तरह से हार हुई । रुसी नेताओं के आग्रह पर शास्त्री जी पाकिस्तान से समझौता करने ताशकन्द गये और वंहा पर उनका 11 जनवरी 1965 को इनका हृदय गति रुक जाने से निधन हो गया देश शास्त्री जी के किये गये कार्यों को हमेशा याद रखेगा।

लालबहादुर शास्त्री जी  को देशभक्ति और ईमानदारी के लिये मरणोपरान्त 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया। 

Monday, 17 April 2017

Gulzarilal Nanda


पूरा नाम - गुलज़ारी लाल नंदा
जन्म - 4 जुलाई 1898
जन्म भूमि - सियालकोट(पश्चिमी पाकिस्तान)
मृत्यु - 15 जनवरी, 1998
  पिता का नाम - बुलाकी राम नंदा
माता का नाम - श्रीमती ईश्वर देवी नंदा

जन्म

गुलज़ारी लाल नंदा' का जन्म 4 जुलाई, 1898 को सियालकोट, जो कि अब पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा है, में हुआ था। इनके पिता का नाम बुलाकी राम नंदा तथा माता का नाम श्रीमती ईश्वर देवी नंदा था। 

शिक्षा

गुलज़ारी लाल नंदा की प्राथमिक शिक्षा सियालकोट में ही संपन्न हुई। इसके बाद उन्होंने लाहौर के ‘फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज’ तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्ययन कर कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की स्नातक उपाधि प्राप्त की। 

कार्यवाहक प्रधानमंत्री के तौर पर 

गुलजारी लाल नंदा ने दो बार भारत के कार्यवाहक प्रधानमंत्री की भूमिका निभाई – दोनों बार 13 दिनों के लिए! पहली बार उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की मृत्यु के बाद सन 19 64 में बनाया गया और दूसरी बार वे लाल बहादुर शाष्त्री के निधन के बाद सन 1966 में कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनाये गए।

पुरस्कार 

गुलज़ारी लाल नंदा एक राष्ट्रभक्त होने के साथ-साथ बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उन्हें राजनीति के अतिरिक्त पढ़ने और पुस्तक लिखने का भी शौक था। अपने जीवनकाल में उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की। उनको राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में अपने अमूल्य योगदान के लिए देश का सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ और सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान ‘पद्म विभूषण’ से नवाजा गया। 

मृत्यु

गुलज़ारी लाल नंदा का देहांत सौ वर्ष की आयु में 15 जनवरी, 1998 को हुआ। वह सादा जीवन उच्च विचार को अपने जीवन का सिद्धांत मानते थे। एक स्वच्छ छवि वाले गांधीवादी राजनेता के रूप में उन्हें सदैव याद किया जायेगा।

Pandit Jawaharlal Nehru


पूरा नाम - पंडित जवाहरलाल नेहरू 
जन्म - 14 नवम्बर 1889
जन्म भूमि - इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश
मृत्यु - 27 मई 1964
मृत्यु स्थान - दिल्ली
अभिभावक - पं. मोतीलाल नेहरू, श्रीमती स्वरूप रानी
 शिक्षा - बैरिस्टर  
विद्यालय - इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल, केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज 

जन्म

नेहरू कश्मीरी ब्राह्मण परिवार के थे, जो अपनी प्रशासनिक क्षमताओं तथा विद्वत्ता के लिए विख्यात थे और जो 18वीं शताब्दी के आरंभ में इलाहाबाद आ गये थे। इनका जन्म इलाहाबाद में 14 नवम्बर 1889 ई. को हुआ। वे पं. मोतीलाल नेहरू और श्रीमती स्वरूप रानी के एकमात्र पुत्र थे।

शिक्षा

उनकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई 14 वर्ष की आयु में नेहरू ने घर पर ही कई अंग्रेज़ अध्यापिकाओं और शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त की। जवाहरलाल के एक समादृत भारतीय शिक्षक भी थे, जो उन्हें हिन्दी और संस्कृत पढ़ाते थे। 15 वर्ष की उम्र में 1905 में नेहरू एक अग्रणी अंग्रेज़ी विद्यालय इंग्लैण्ड के हैरो स्कूल में भेजे गये।  जहाँ वह दो वर्ष तक रहे। और हैरो से वह केंब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज गए, जहाँ उन्होंने तीन वर्ष तक अध्ययन करके प्रकृति विज्ञान में स्नातक उपाधि प्राप्त की। उनके विषय रसायनशास्त्र, भूगर्भ विद्या और वनस्पति शास्त्र थे। केंब्रिज छोड़ने के बाद लंदन के इनर टेंपल में दो वर्ष बिताकर उन्होंने वकालत की पढ़ाई की।

परिवार 

भारत लौटने के चार वर्ष बाद मार्च 1916 में नेहरू का विवाह कमला कौल के साथ हुआ, जो दिल्ली में बसे कश्मीरी परिवार की थीं। उनकी अकेली संतान इंदिरा प्रियदर्शिनी का जन्म 1917 में हुआ; बाद में वह, विवाहोपरांत नाम 'इंदिरा गांधी', भारत की प्रधानमंत्री बनीं। तथा एक पुत्र प्राप्त हुआ, जिसकी शीघ्र ही मृत्यु हो गयी थी।

भारत के प्रथम प्रधानमन्त्री

सन् १९४७ में भारत को आजादी मिलने पर जब भावी प्रधानमन्त्री के लिये कांग्रेस में मतदान हुआ तो तो सरदार पटेल को सर्वाधिक मत मिले। उसके बाद सर्वाधिक मत आचार्य कृपलानी को मिले थे। किन्तु गांधीजी के कहने पर सरदार पटेल और आचार्य कृपलानी ने अपना नाम वापस ले लिया और जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमन्त्री बनाया गया। 1947 में वे स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमन्त्री बने। अंग्रेजों ने करीब 500 देशी रियासतों को एक साथ स्वतंत्र किया था और उस वक्त सबसे बडी चुनौती थी उन्हें एक झंडे के नीचे लाना। उन्होंने भारत के पुनर्गठन के रास्ते में उभरी हर चुनौती का समझदारी पूर्वक सामना किया। जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। उन्होंने योजना आयोग का गठन किया, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहित किया और तीन लगातार पंचवर्षीय योजनाओं का शुभारंभ किया। उनकी नीतियों के कारण देश में कृषि और उद्योग का एक नया युग शुरु हुआ। नेहरू ने भारत की विदेश नीति के विकास में एक प्रमुख भूमिका निभाई।


क़िताबे

आत्मचरित्र (1936) (Autobiography)
दुनिया के इतिहास का ओझरता दर्शन (1939) (Glimpses Of World History).
भारत की खोज (1946) (The Discovery Of India) आदी। 

पुरस्कार 

1955 में भारत का सर्वोच्च नागरी सम्मान ‘भारत रत्न’ पंडित नेहरु को देकर उन्हें सम्मानित किया गया। 


 विशेषता

आधुनिक भारत के शिल्पकार।
पंडित नेहरु का जन्मदिन 14 नवम्बर  ये ‘बालक दिन’ के रूप में मनाया जाता है।


मृत्यु

उन्हें 1963 में दिल का हल्का दौरा पड़ा, जनवरी 1964 में उन्हें और दुर्बल बना देने वाला दौरा पड़ा। कुछ ही महीनों के बाद तीसरे दौरे में 27 मई 1964 में उनकी मृत्यु हो गई।